वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जीवन परिचय. Veer Chandra Singh Garhwali

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हेलो दोस्तों स्वागत है आपका देवभूमि उत्तराखंड के आज के नए लेख में। आज के इस लेख के माध्यम से हम आप लोगों के साथ उत्तराखंड के महान क्रांति वीर वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के जीवन परिचय ( Veer Chandra Singh Garhwali Biography) के बारे में जानकारी देने वाले हैं। देवभूमि उत्तराखंड में ऐसे अनेक से महान विभूतियों ने जन्म लिया जिनकी बदौलत से उत्तराखंड राज्य को एक अलग पहचान मिली और एक अलग शान मिली। उन्हीं लोगों को स्मरण करते हुए उत्तराखंड में तरह-तरह के लोग पर्व एवं स्मरण दिन मनाएं जाते है। या उनकी यादों को ताजा करने के लिए स्मरण बनाए जाते हैं। उत्तराखंड के इतिहास में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली एक महान क्रांति वीर के रूप में पहचाने जाते हैं। आज के इस लेख के माध्यम से हम आप लोगों के साथ उत्तराखंड के महान क्रांति वीर वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का जीवन परिचय के बारे में ( Veer Chandra Singh Garhwali Biography) जानकारी देने वाले हैं। आशा करते हैं कि आपको हमारा यह लेख पसंद आएगा। इसलिए इस लेख अंत तक जरूर पढ़ना।

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जीवन परिचय. Veer Chandra Singh Garhwali Biography

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का जन्म 25 दिसंबर 1891 को उत्तराखंड के ग्राम मौसी सैनीसेरा, पौड़ी गढ़वाल में हुआ। इनके पिता का नाम श्री जाथली सिंह है। प्रसिद्ध पेशावर कांड के नायक अटूट देश प्रेमी एवं महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में पहचाने जाने वाले वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड के महान व्यक्तियों में से एक है जिन्हें आज भी पूरा देश दिल से स्मरण करते हैं।

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली शिक्षा.Veer Chandra Singh Garhwali Biography

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी की शिक्षा के बारे में कहां जाता है कि उनके बाल निकल विद्यार्थी जीवन से होकर नहीं गुजरा था। मुख्य कारण है कि उन्हें बचपन से ही पारिवारिक गरीबी देखने को मिली। जिसका जिक्र कुंवर सिंह नेगी ‘ कर्मठ ‘ लिखते हैं कि प्रेमचंद सिंह गढ़वाली जी के पिता अपने पुत्र की शिक्षा व्यवस्था करना चाहते थे परंतु गांव के नजदीक स्कूल के अभाव में वह ऐसा नहीं कर पाए। आर्थिक कमजोरी के कारण वह अपने पुत्र को किसी डर के अच्छे से विद्यालय में नहीं भेज सके थे। हालांकि वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी ने ईसाई अध्यापक से दर्जा दो तक पढ़ना लिखना सीख लिया था। हालांकि कर्मठ जी यह भी लिखते हैं कि उन्हें पढ़ने लिखने का शौक नहीं था बचपन से ही वह नटखट और चंचल प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। शरीर से हष्ट पुष्ट होने के कारण वह अपने सम वयस्क बालक बालिकाओं के दल का नेतृत्व करते थे। तेरे से वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी की शिक्षा अधूरी रही लेकिन शिक्षा के अधूरी रहने की बावजूद भी उनमें सेवा में भर्ती होने का जुनून बचपन से ही था।

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली किशोर अवस्था. Veer Chandra Singh Garhwali Biography In Hindi

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी का बाल्यकाल काफी स्वतंत्र एवं उन्मुक्त तरह से व्यतीत हुवा। गढ़वाल की दिवगत विभूतियां के माध्यम से हमें इस बात की पुष्टि होती है कि वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी बाल्यकाल से बच्चों के नेतृत्व के साथ-साथ उनके मुखिया भी बने रहते थे।

किशोर अवस्था में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी की शादी उन्हीं के गांव के समीप रहने वाली लडकी से कराई जाती हैं। वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की आत्मकथा के अनुसार वह लडकी उनसे दो वर्ष बड़ी थी।

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने बाल्य काल में जो शादी की थी उनसे उनकी कोई संतान नहीं हुई जिसके कारण उनके पिता ने उनकी दूसरी शादी की और उसे दूसरी शादी से उनकी एक कन्या हुई। वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी का तीसरा विवाह भी हुवा । लेकिन उनसे उन्हे कोई भी संतान नही मिली। इनके पिता उनके संतान के प्रति बहुत चिंतित रहते थे। इसलिए उन्होने वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी की चौथी शादी भी कराई। इस तरह से वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी की किशोर अवस्था व्यतीत हुई।

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली सेवा में भर्ती. Veer Chandra Singh Garhwali Biography

उत्तराखंड के महान नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जब 22 वर्ष के थे उसे समय प्रथम विश्व युद्ध शुरू हो गया था बड़े पैमाने पर सेवा में भारती खुलने लगी थी। उसे समय एक भर्ती करने वाला गढ़वाली हवलदार उनके गांव पहुंचा और उन्हें सेवा में भर्ती होने का एक सुनहरा अवसर दिया। वह भाग कर उसे हवलदार के पीछे पीछे लैंसडाउन तक पहुंच गए। सन 11 सितंबर 1914 को इन्हें लैंसडाउन स्थित गढ़वाली फौज में भर्ती कर लिया गया। शरीर के हष्ट पुष्ट वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी को फौजी की ट्रेनिंग में शीघ्र ही सफलता हासिल हुई।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान यानी कि अगस्त 1915 में मित्र राष्ट्रों की ओर से अपने सैनिक साथियों के साथ यूरोप और मध्य पूर्वी क्षेत्र में प्रत्यक्ष हिस्सेदारी निभाने वाले सैनिकों में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी भी थे। 1917 में अंग्रेजों की ओर से मेसोपोटामिया के युद्ध में भाग लिया और 1921 से 1923 की अवधि में पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में सेवा में रहे।

1920 के बाद वीर चंद्र सिंह गढ़वाली देश में घटित राजनीतिक घटनाओं में रुचि लेने लगे। 1929 में गांधी जी कुमाऊं भ्रमण पर आए और वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी उन दोनों छुट्टी पर आए हुए थे तो हुए गांधी जी से मिलने बैगन से पहुंचे और गांधी जी के साथ टोपी लेकर जीवन भर उसकी कीमत चुकाने का प्रण लिया। इस तरह से भी चंद्र सिंह गढ़वाली जी का सेवा में भर्ती का जुनून और देश के प्रति समर्पण दिखाई देता है।

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली पेशावर कांड में योगदान. Veer Chandra Singh Garhwali Pesawar Kand

सन 1930 में बटालियन का पेशावर जाने का हुक्म प्राप्त हुआ और 23 अप्रैल 1930 को पेशावर में किस्साखानी बाजार में खान अब्दुल गफ्फार खान लाल कुर्ती खुदाई खिदमतगारों की एक आम सभा हो रही थी। अंग्रेजों का मुख्य मकसद आजादी के इन दीवानों को तीतर भीतर करना था जो की बल के प्रयोग से ही संभव था।

कैप्टेन रिकेट 72 गढ़वाली सैनिकों को लेकर जलसे वाली जगह पर पहुंच गए और निहत्थे थे पठानों पर गोली चलाने का हुक्म दे दिया। सेज फायर का ऑर्डर मिलने पर सैनिकों ने अपनी बंदूक के नीचे कर दी जबकि वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी ने कैप्टन रीकेट से कहां हम लोग निहत्थों पर गोली नहीं चलाते।

तुरंत बाद गैरों की फौजी टुकड़ी से गोलियां चलाई गई चंद्र सिंह का और गढ़वाली पलटन के उन जानवरों का यह अद्भुत और असाधारण साहस था। सरकार ने इस हुकुम अदूली को राजद्रोह करार दिया। और हवलदार 253 यानी कि वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी को मृत्युदंड का अजन्म कारावास की सजा सुनाई गई। तो इस तरीके से वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी का पेशावर कांड में अपना महान योगदान रहता है हालांकि इसके बावजूद उनके 39 सैनिकों को कोर्ट मार्शल के माध्यम से नौकरी से निकाल दिया जाता है।

चंद्र सिंह गढ़वाली जी की मृत्यु. Veer Chandra Singh Garhwali Biography

अगस्त 1979 में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली कोटदार शहर में बहुत बीमार पड़ गए थे। कुंवर सिंह नेगी अपनी पुस्तक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की आत्मकथा में लिखते हैं कि तत्कालीन वित्त मंत्री हेमती नंदन बहुगुणा को जब पता चला कि जितेंद्र सिंह गढ़वाली बहुत बीमार है तो उन्होंने अपनी कार कोटद्वार भेजी और उन्हें डॉक्टर राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल दिल्ली में भर्ती कराया गया है। श्रीमती नंदन बहुगुणा समय-समय पर उनकी देखभाल के लिए अस्पताल में भी आते रहे।

डॉ राम मनोहर लोहिया अस्पताल मैं वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी का सर्वोत्तम इलाज हुआ। लेकिन उनका वृद्ध शरीर अब अधिक चलने के लायक नहीं रह गया था। आखिरकार सन 1 अक्टूबर 1979 को 87 वर्ष की आयु में उत्तराखंड के महान व्यक्ति पेशावर कांड के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी ने संसार से विदाई ले ली।

दोस्तों यह था हमारा आजकल एक जिसमें हमने आपको वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी का जीवन परिचय के बारे में जानकारी दी । आशा करते हैं कि आपको हमारा यह लेख वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जीवन परिचय के बारे में पढ़कर अच्छा लगा होगा। आपको यह लेख पसंद आया है तो अपने दोस्तों और परिवार के साथ जरूर साझा करें।

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