हरिद्वार का इतिहास, History of Haridwar

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हेलो दोस्तों स्वागत है आपका देव भूमि उत्तराखंड की आज के नई लेख में। इस लेख में हम आपको उत्तराखंड के हरिद्वार के बारे में जानकारी देने वाले हैं। हरीद्वार एवं हरिद्वार के इतिहास ( History of Haridwar) से जुड़ी कुछ विशेष मान्यताएं जिनके कारण पवित्र माना जाता है। आज हरिद्वार से जुड़ी कुछ ऐसी मान्यताओं और इतिहास के बारे में बताने वाले हैं जिनके बारे में शायद ही अपने पहले सुना होगा। इसलिए इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ना और चलिए आज के लिए शुरू करते हैं।

उत्तराखंड में हरिद्वार. About To Hardwaar

वैसे तो दोस्तों यह कोई पूछे जाने वाला प्रश्न नहीं है कि हरिद्वार कहां स्थित है ( haridwar kaha hai ) लेकिन फिर भी हम आपको बताना चाहते हैं कि हरिद्वार भारत के प्रसिद्ध राज्य उत्तराखंड में स्थित है जो की भारत के पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है। 2360 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला हुआ हरिद्वार 250 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है । वैसे हरिद्वार का शाब्दिक अर्थ ” हरि तक पहुंचाने का द्वारा ” माना जाता है। प्रकृति प्रेमियों के लिए हरिद्वार एक स्वर्ग है यहां पर भारतीय संस्कृति और सभ्यता की बहुरूपदर्शिका प्रस्तुत होती है। हरिद्वार उन चार स्थानों में से एक है जहां पर हर 6 साल बाद अर्ध कुंभ और हर 12 वर्ष बाद कुंभ मेला का आयोजन किया जाता है। हरिद्वार वह शहर है जहां से गंगा नदी पहाड़ों से मैदाने की ओर वहना शुरू करती है।

हरिद्वार का इतिहास.History of Haridwar

वैसे हरिद्वार का इतिहास बहुत पुराना और रहस्य में से भरा हुआ है। भारत के प्राचीन नगरों में से एक माना जाता है। उत्तराखंड के चार धामों का पवित्र प्रवेश द्वारा भी हरिद्वार ही माना जाता है। यहां भगवान शिव और विष्णु की भूमि है उन्हे सत्ता की भूमि के रूप में पहचाना जाता है। हरिद्वार भारत की जटिल संस्कृति और सभ्यता का खजाना है। हरिद्वार का मायापुरी शहर को गंगा द्वारा और कपिलास्थान की मान्यता प्राप्त है जिसे गेटवे ऑफ द गॉड्स भी कहा जाता है। हरिद्वार का इतिहास में हरिद्वार का प्राचीन एवं पौराणिक नाम मायापुरी उल्लेखित है जिसकी सप्त मोक्षदायिनी पुरियों में गिनती की जाती है। हरिद्वार के इतिहास ( History of Haridwar) में यह भी विख्यात है कि पौराणिक समय में समुद्र मंथन में अमृत की कुछ बूंदे हरिद्वार में गिर गई थी। करण हरिद्वार को भारत के पवित्र स्थान में से एक माना जाता है और यहां पर हर 12 वर्ष में कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है।

हर की पौड़ी क्यों कहा जाता है हरिद्वार को

ऐतिहासिक मान्यताओं में हरिद्वार को हर की पौड़ी के नाम से भी पहचाना जाता है। किवदंति है की हरिद्वार में हर की पौड़ी नाम का एक घाट है जहां पर भगवान हरी आएं थे और इस स्थान पर उनके चरण पड़े थे। हरिद्वार को हर की पौड़ी के नाम से भी पहचाना जाता है।

हरिद्वार को प्राचीन समय से ही ऋषियों की तपस्या भूमि के रूप में पहचाना जाता है। यहां पर विभिन्न ऋषि मुनियों के तपस्या करने के बारे में जानकारियां मिलती है। राजा स्वेत ने घर की पौड़ी में भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या की थी। जब भगवान ब्रह्मा श्वेत की तपस्या से प्रसन्न हुए तो उन्होंने वरदान मांगने को कहा, तब राजा श्वेत ने वरदान में यह मांगा की हर की पौड़ी को ईश्वर के नाम से जाना जाए। तब से यह जगह ब्रह्मा कुंड के नाम से पहचानी जाती है।

हरिद्वार के बारे में कुछ रोचक तथ्य.Some interesting facts about Haridwar

घर के बारे में कुछ रोचक तथ्य कुछ इस प्रकार से है

  • प्राचीन इतिहासकारों के अनुसार हरिद्वार को खांडव वन के नाम से प्रसिद्ध था यहां पर पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान छिप कर रहे।
  • किवदंति है की सप्त ऋषियों द्वारा इस स्थान पर तप करने के कारण गंगा को सात धाराओं में बहाना पड़ा।
  • 634 में चीनी यात्री हेनसांग घर आए थे उन्होंने इस नगर को मो यू लो तथा महाभाद्र कहा।
  • जैन ग्रंथ के अनुसार, प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान आदित्यनाथ ने हरिद्वार के मायापुरी क्षेत्र में रहकर तपस्या की थी।
Haridwar ka itihas

दोस्तों यह था हमारा आज का लेख जिसमें हमने आपको उत्तराखंड की हरिद्वार शहर का इतिहास के बारे में ( History of Haridwar) जानकारी दी। आशा करते हैं कि आपको हरिद्वार शहर के बारे में जानकारी मिल गई होगी। पहले कैसा लगा हमें कमेंट के माध्यम से बताएं और यदि आपको यह लेख पसंद आया है तो अपने दोस्तों और परिवार के साथ जरूर साझा करें। उत्तराखंड से संबंधित ऐसे ही जानकारी युक्त लेख पाने के लिए आप देवभूमि उत्तराखंड को फॉलो कर सकते हैं।

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